नीमकाथाना में बंद के दौरान हुए उपद्रव का मामला, गिरफ्तार आरोपियों की ओर से तीन जमानत आवेदन पेश किए गए थे, सभी आराेपी एक महीने से सबजेल में हैं। 

नीमकाथाना- एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ दलित संगठनों के विरोध में हुए भारत बंद के दौरान तोड़फोड़, आगजनी व उपद्रव के मामले में शुक्रवार को यहां एडीजे कोर्ट ने 13 आरोपियों का जमानत आवेदन खारिज कर दिया।

मामले में गिरफ्तार आरोपियों की तरफ से अपर जिला एवं सेशन न्यायाधीश के यहां तीन जमानत आवेदन पेश किए गए। इनमें खुद को निर्दोष बताते हुए पुलिस पर जबरन उठाकर गिरफ्तार करने के आरोप लगाए गए। बुधवार को जमानत आवेदन पर बहस हुई थी।

उसमें अपर लोक अभियोजक ने तोड़फोड़ व आगजनी की घटना में शामिल आरोपियों को जमानत देने का विरोध किया। घटना में एएसपी धनपतराज सहित कई पुलिस अधिकारी व जवान घायल हुए थे। मामले में पुलिस ने 23 लोगों को गिरफ्तार किया था। प्रकरण में 150 लोग नामजद हैं।

एडीजे गोविंद वल्लभ पंत ने जमानत बहस सुनने के बाद फैसला 11 मई तक सुरक्षित रखा था।

कोर्ट ने माना कि अभियुक्तों के खिलाफ गंभीर अपराध करने के आरोप हैं। ऐसी सूरत में अभियुक्त को जमानत का लाभ दिया जाना उचित प्रतीत नहीं होता।

23 लोगों को गिरफ्तार किया था 

एससी-एससी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध में हुए भारत बंद के दौरान नीमकाथाना में तोड़फोड़ व आगजनी की घटना हुई। पुलिस ने अलग-अलग प्रकरणों में 23 लोगों को गिरफ्तार किया था। इनमें कॉलेज प्रोफेसर व शिक्षक भी शामिल हैं। सभी आरोपी एक माह से सबजेल में बंद हैं। तीन लोगों के जमानत आवेदन पूर्व में कोर्ट ने खारिज कर दिए थे।

13 लोगों के तीन जमानत आवेदन 

सबजेल में बंद 13 आरोपियों की तरफ से एडीजे कोर्ट में जमानत के लिए तीन आवेदन पेश किए गए। वकीलों ने कहा कि सभी लोग निर्दोष है। पुलिस ने गलत तरीके से लोगों को बंद किया है। सबजेल में एक महीन से ज्यादा वक्त होने को जमानत का आधार बनाया गया है।

मामले में आरोपी विकास पुत्र नेकीराम, जीतू उर्फ जितेंद्रसिंह, राहुल पुत्र सुभाष, हंसराम पुत्र रामेश्वर, चौथमल पुत्र नाथूराम, महेंद्र पुत्र बोदूराम, रविंद्र पुत्र गोपाल, यादराम पुत्र मालीराम, पंकज पुत्र शिवपाल मेहरानियां, मनीष पुत्र शिवपाल, बाबूलाल पुत्र चोखाराम, अशोक वर्मा पुत्र छोटेलाल, संजय कुमार पुत्र आशाराम का जमानत आवेदन खारिज किया।

कोर्ट ने कहा- अनुसंधान अधिकारी की तफ्तीश संंदिग्ध प्रतीत होती है

कोर्ट ने कहा कि 12 अप्रैल के बाद किसी घायल के बयान दर्ज नहीं किए। ऐसे आंदोलन से जनजीवन प्रभावित होता है। बच्चे स्कूल नहीं जा पाते। आमजन को जानमाल का नुकसान उठाना पड़ता है। लोग इतने भयग्रस्त होते हैं कि बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। यातायात व व्यापार प्रभावित होता है।

केस डायरी में फोटो देखने पर सरकारी व निजी वाहन जलाने, दुकानों व पेट्रोल पंप पर तोड़फोड़ प्रतीत होती है। बिना किसी तथ्य के धारा हटाई गई। प्रकरण में 12 घायलों में केवल तीन के बयान दर्ज किए गए।

मामले में एएसपी धनपतराज, महावीर, प्रसाद, पवन कुमार, मनीराम, सुरेंद्र कुमार, रतनलाल, माधूराम व रामकुमार के बयान भी नहीं लिए। ऐसे में अनुसंधान अधिकारी की तफ्तीश संदिग्ध लगती है। कोर्ट में पुलिस की तरफ से तथ्यात्मक रिपोर्ट पेश हुई। उसमें जमानत करने वाले आरोपियों को धारा 307 का अपराधी नहीं माना गया।

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