नेत्रहीन हैं, पर इनकी बनाई डिज़ाइनर कुर्सियां देख दंग रह जाएंगे आप

Sonu Roy
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चीफ़ एडिटर मनीष टांक की ख़ास रिपोर्ट..
नीमकाथाना न्यूज़.इन

क्सर अपने आसपास नेत्रहीन लोगों को देखकर हमारे मन में ख्याल आता है कि वह अपना जीवन कैसे जीते होंगे लेकिन यह हमारी छोटी सोच है, क्योंकि सही मौका दिया जाए तो नेत्रहीन भी अपनी दिव्यांगता से ऊपर उठकर खुद को साबित कर सकते हैं। ऐसी ही कहानी अशोक कुमार सैनी की हैं, जो एसएनकेपी कॉलेज में फर्नीचर की कुर्सियों में प्लास्टिक डोरी की सहायता से बुनाई कर आकर्षित शैली में आकार देने का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि खेतड़ी तहसील से रोजाना आता जाता हूं। 
कुर्सियों में अंदाजे से देते हैं डिजाइन
अशोक कुर्सियों में बारीकी से अपने अंदाजे से प्लास्टिक की डोरी से डिजाइन देते हैं उन्होंने बताया कि अलग अलग प्रकार की डिजाइन बनाई जाती हैं। करीब एक कुर्सी को तैयार करने में 4 से 5 घंटे का समय लग जाता हैं। 
27 साल पहले जयपुर से सीखा काम
डिजाइन करने के दौरान अशोक ने बताया कि ये काम मैनें 1993 में जयपुर में सीखा था। काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा। लेकिन मन में दृढ़ इच्छा थी। काम को बड़ी लग्न भाव से पकड़ा और आज कई प्रकार की प्लास्टिक डोरियों की कुर्सियों की डिजाइन तैयार कर सकता हूं। 

बचपन में 4 वर्ष की उम्र में हुए नेत्रहीन

अशोक 4 वर्ष की उम्र में नेत्रहीन हो गए थे। उन्होंने बताया कि मेरा नेत्रहीन होना मुझे मालूम नहीं लेकिन बचपन में आंखों की रोशनी चली गईं थी। आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण से ईलाज करवाना मुश्किल था। तब से देख नहीं पाता। लेकिन किसी पर मोहताज नहीं हूं कुर्सियों की डिजाइन का कार्य कर घर चला रहा हूं। 

मुश्किल से चलती है आजीविका, मां का ही सहारा

अशोक ने बताया कि उनकी पेंशन से ही उनका भरण पोषण होता है विकलांग पेंशन के आधार पर उन्हें 750 रुपए मिलते हैं जिससे उन का भरण पोषण होता है। अशोक की माता वृद्ध है वही उनका सहारा है। नेत्रहीन होने के कारण अशोक की मां ही उनके लिए खाना तैयार करती है ऐसे में अशोक का मां ही एकमात्र सहारा है। इस पर प्रकार की कुर्सियां एसएनकेपी कॉलेज में ही हैं जिनकी बुनाई का कार्य अशोक ही करते हैं।

हिम्मत और हौसले से खुश
इस हिम्मत और हौसले से खुश हैं कि वह या उनका परिवार लाख परेशानियों के बावजूद, कभी किसी पर निर्भर नहीं रहा। आगे भी उनकी बस यही एक छोटी सी ख्वाहिश है।

प्लास्टिक कुर्सियां व सोफा सेट से हुआ कार्य लुप्त
अशोक बताते हैं कि प्लास्टिक डोरी वाली कुर्सियां कम हो गई। क्योंकि प्लास्टिक कुर्सियां व सोफा सेट ने इस डिजाइन की कुर्सियां लुप्त होती जा रही हैं इसलिए डिजाइन का कार्य भी लुप्त होता जा रहा हैं। 

आशा है आपको भी इनकी हिम्मत व हौसले से प्रेरणा जरूर मिली होगी...

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