प्राचीन होलिका दहन स्थल पर पारंपरिक तरीके से होली का डांडा रोपा



नीमकाथाना। माघ शुक्ल पूर्णिमा पर बुधवार को नीम का थाना शहर में प्राचीन होलिका दहन स्थल होली का टीला पर पारंपरिक तरीके से होली का डांडा रोपा गया। यह परंपरा शहरवासियों ने पूरे उत्साह व श्रद्धा के साथ निभाई। सर्वप्रथम पंडितों ने होलिका स्थल का पूजन आरंभ किया। मंत्र उच्चारण के साथ रस्म निभा होली का डांडा स्थापित किया गया।
शहर में सबसे प्राचीन होलिका दहन स्थल
नरेंद्र सिंह तंवर ने बताया कि होली का टीला शहर का सबसे प्राचीन होलिका दहन स्थल है। बदलते परिवेश व आधुनिक समय में सब कुछ बदल गया है। पहले शहर में केवल होली का टीला पर ही होलिका दहन होता था। 36 कौम के लोग यहां होलिका दहन को आते थे।

कब रोपा जाता है होली का डांडा
पं. पुरुषोत्तम शर्मा ने बताया कि माघ शुक्ल पूर्णिमा के दिन होली का डांडा रोपा जाता है। हालांकि अब शहर में अधिकांश जगह होली का डांडा होलिका दहन के 1 दिन पूर्व ही रोपण कर खानापूर्ति कर दी जाती है।

क्या होता है होली का डांडा
पं.हेमंत शर्मा ने बताया कि होली उत्सव से पहले होली का डांडा चौराहे पर गाड़ना होता है। यह डांडा एक खेजड़ी के शाख का बना होता है। इसे भक्त पहलाद का प्रतीक माना जाता है। होली के दिन इसके चारो और छड़ी के ढेर लगा दिए जाते है। महिलाएं दिन में होलिका की पूजा करती है। रात्रि में होलिका दहन कर दिया जाता है।

होलिका दहन से पूर्व होली का डांडा निकाल लिया जाता है
फाल्गुन मास की पूर्णिमा की रात्रि को होलिका दहन किया जाता है होलिका दहन से पहले होली के डांडा को निकाल लिया जाता है।

खत्म हो रही है होली का डांडा लगाने की प्रथा
पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता जुगल किशोर ने बताया कि होली से 1 माह पहले जगह-जगह होली का डांडा लगाने की प्रथा समाप्त हो रही है। शहर में अब कई जगह होलिका दहन होती है लेकिन होली का डांडा रोपने की परंपरा नहीं निभाई जाती। केवल होली के 1 दिन पूर्व खानापूर्ति के साथ होली का डांडा रोपा जाता है। इस दौरान चंद्रभान सिंह,नरेंद्र सिंह तंवर,संजय,लक्ष्मण सिंह,जुगलकिशोर सहित अन्य शहरवासी मौजूद रहे।
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