25 करोड़ रुपए खर्च होंगे, स्कूल का नाम भी शहीद के नाम पर होगा, परिवार के एक व्यक्ति को मिलेगी सरकारी नौकरी, प्रदेश में 1999 से पहले के करीब 1650 शहीदों में से 1100 की प्रतिमा नहीं

स्पेशल रिपोर्ट: राजस्थान देश का पहला राज्य है, जहां साल 1999 के पहले के प्रत्येक शहीद सैनिक की प्रतिमा उनके गांव में लगाई जाएगी। गांव के स्कूल का नाम भी शहीद के नाम पर होगा। परिवार से एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी भी दी जाएगी। इन लोगों को नियुक्ति देने की प्रक्रिया चार महीने में पूरी कर दी जाएगी।

सर्किट हाउस में हुई प्रेसवार्ता के दौरान जानकारी देते हुए।
प्रदेश में 1999 से पहले के करीब 1650 शहीद हैं। इनमें से 1100 की कोई प्रतिमा नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि इनमें कई शहीद ऐसे हैं, जिनकी तस्वीर उनके परिवार के पास नहीं है। इसलिए सेना मंत्रालय के रिकॉर्ड से इनकी तस्वीर ली जा रही है।

शहीद सैनिक सम्मान यात्रा लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में भी दर्ज होगी। इसके लिए शहीद सैनिक सम्मान यात्रा का आवेदन स्वीकार हो चुका है। सैनिक कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष व राज्य मंत्री प्रेमसिंह बाजौर बताते हैं कि शहीदों की प्रतिमा लगाने पर करीब 25 करोड़ रुपए खर्च होंगे।

यह राशि सरकार के स्तर पर नहीं, बल्कि बाजौर खुद के जेब से खर्च करेंगे। सैनिक यात्रा अब तक एक लाख किलोमीटर का सफर तय कर चुकी हैं।

बाजौर कहते हैं-सेना पर पत्थर बरसाने वाले और सवाल उठाने वाले एक बार रणबांकुरों की धरती राजस्थान जरूर आएं। क्योंकि-यहां एक साल से सैनिकों और उनके परिवार के सम्मान के लिए यह सैनिक यात्रा निकाली जा रही है। इसके मायने सैनिक परिवार के सम्मान से जुड़े हैं। राज्य के 22 जिलों में निकाली जा रही यात्रा में वीरांगनाओं व परिजनों का सम्मान भी किया जा रहा है।

हर विधानसभा क्षेत्र में शहीद सैनिक सम्मान यात्रा पर 25 लाख रुपए खर्च

प्रेमसिंह बाजौर से मीडिया ने बातचीत कर इस यात्रा से जुड़ी कुछ रोचक बातें जानी। उन्होंने बताया कि हर विधानसभा में यात्रा पर करीब 25 लाख रुपए खर्च किए जा रहे हैं। शहीद के परिवार के व्यक्ति को सरकारी नौकरी देने की प्रक्रिया चार महीने में पूरी कर दी जाएगी।

बाजौर ने कहा कि सेना और शहीदों पर राजनीति हो रही है। हमने कांग्रेस, माकपा सहित सभी पार्टियों के पूर्व विधायक, वर्तमान विधायक और अन्य नेताओं को भी निमंत्रण दे रहे हैं, लेकिन वे नहीं आ रहे हैं।

यात्रा क्यों: 1999 से पहले के शहीदों को लेकर कोई योजना नहीं है। इन शहीदों की न तो सरकारों ने मूर्तियां लगाई और न ही परिवार के लिए कुछ किया। प्रतिमा लगाने के लिए दिक्कत यह थी कि सरकार जमीन दे सकती है। एमएलए व सांसद कोटे से चार दीवारी बनाई जा सकती है, लेकिन प्रतिमा के लिए सरकार के पास प्रावधान नहीं है।

जरूरी क्यों: बाजौर कहते हैं-झुंझुनूं का उदाहरण लीजिए। यहां के एक गांव में तीन शहीद थे। 1962 और 1965 के भी। इनके बारे में लोगों को जानकारी ही नहीं थी। सैनिकों की वजह से हम सुरक्षित हैं। ये देवता से कम नहीं हैं।

अब तक क्या:  22 जिलों में 1016 शहीद सैनिक वीरांगनाओं व परिजनों का सम्मान किया जा चुका है। जबकि 1440 आवेदन समस्याओं से जुड़े प्राप्त हुए हैं।

झुंझुनूं सेचुनाव लड़ने का कोई इरादा नहीं, पार्टी के आदेश हुए तो अलग बात : 

बाजौर विधायक बाजौर का कहना है कि झुंझुनूं से चुनाव लड़ने का कोई इरादा नहीं है। यह पहले भी बता चुका हूं। प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा कि पार्टी जहां से आदेश करेगी, वहां से चुनाव लड़ेंगे। उन्होंने कहा कि शहीद सम्मान सैनिक यात्रा में अभी तक स्कूल नामकरण के 65, भूमि आवंटन से जुड़ी समस्या के 20 और सड़क बनाने के लिए 25 आवेदन मिले हैं।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में सांसद सुमेधानंद, स्वास्थ्य राज्य मंत्री बंशीधर बाजिया, शहर विधायक रतनलाल जलधारी, यूआईटी चेयरमैन हरिराम रणवां, जिला प्रमुख अपर्णा रोलन व शहीद सैनिक सम्मान समिति के सदस्य कर्नल जगदेव सिंह आदि मौजूद थे।

सोर्स- दैनिक भास्कर

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