राजा जवाहरसिंह भरतपुर एवं महाराजा माधोसिंह जयपुर के मध्य मावंडा-मंढोली का ऐतिहासिक युद्ध

मावंडा-मंढोली @ आज हम इतिहास के पन्नों से ऐसे ही युद्ध की एक गाथा को दोहरा रहें है जो राजस्थान में सीकर जिले के नीम का थाना शहर के पास स्थित माऊंडा और मंढोली गाँवों के पास सन् 14 दिसंबर 1767 को लड़ा गया था।

राजस्थान के इतिहास में भरतपुर के जाट राजा सूरजमल, जवाहरसिंह आदि का नाम वीरता और शौर्य के लिए प्रसिद्ध रहा है। सूरजमल के पिता बदनसिंह ने भरतपुर का राज्य अपने चचेरे भाई चूडामण के पुत्र से जयपुर के महाराजा जयसिंह की सहायता से हासिल किया था। यही कारण था कि बदनसिंह जिसे महाराजा जयसिंह ने मुग़ल सल्तनत से राजा के तौर पर मान्यता दिलवाई का बड़ा अहसान मानते थे और अपने आपको जयपुर का सामंत समझते थे। बदनसिंह के निधन के बाद उनके पुत्र सूरजमल भरतपुर के राजा बने और उन्होंने जीवन पर्यंत जयपुर के साथ रिश्ते निभाये और स्वयं को जयपुर के एक सामन्त से अधिक नहीं माना।

मावंडा-मंढोली युद्ध क्षेत्र में बनी छतरियां
जवाहरसिंह के सौतेला भाई नाहरसिंह धौलपुर के शासक थे। नाहरसिंह की पत्नी अत्यन्त रूपवती थी और जवाहरसिंह की उस पर कुदृष्टि थी। उसने मराठों सिखों और गोहद के राणा की सहायता से नाहरसिंह को युद्ध में हरा दिया, जिसने शाहपुरा में विषपान द्वारा आत्महत्या कर ली (6 दिसम्बर 1766)। जवाहरसिंह ने विजेता के रूप में नाहर सिंह की विधवा और उसके खजाने की माँग की, जिसे जयपुर के महाराजा माधोसिंह ने अनुचित माना। नाहरसिंह की विधवा ने आत्महत्या करके स्वयं को ग्लानि से बचाया। इसी प्रकरण को लेकर जवाहरसिंह महाराजा माधोसिंह पर क्रोधित हुआ।

जवाहरसिंह के सिख छापामार जयपुर राज्य में भी घुसपैठ कर रहे थे। माधोसिंह ने भरतपुर के खिलाफ़ भरतपुर के दुश्मनों का मोर्चा बनाने की असफल चेष्टा भी की। जवाहरसिंह ने मराठों और बुन्देलों पर विजय से तृप्त होकर अपने गोरों द्वारा प्रशिक्षित जाट सवारों के साथ पुष्कर की ओर जयपुर क्षेत्र में होते कूच किया। 6 नवम्बर 1767 को पुष्कर सरोवर के तट पर जोधपुर के महाराजा विजयसिंह की जवाहर सिंह से भेंट हुई।

दोनों पगड़ी बदल कर भाई बने और एक ही जाजम पर बैठकर चर्चाएं की, फिर उन्होंने माधोसिंह को भी वहाँ आने का निमंत्रण भेजा। चूँकि माधोसिंह जवाहरसिंह द्वारा जयपुर राज्य की सीमाओं में घुसपैठ से पहले से नाराज थे सो नहीं आये और विजयसिंह को उत्तर दिया कि उसने एक किसान के बेटे को अपना पगड़ी बदल कर भाई बनाकर अपने राठौड़ कुल को कलंकित किया है।

इस पत्र की जानकारी मिलने के बाद जवाहरसिंह आगबबूला हो गया। वह लौटते हुए तबाही और कत्ले आम करता हुआ जयपुर की ओर आया। तबाही की सूचना मिलते ही जयपुर राज्य सेना ने जवाहरसिंह की सेना पर आक्रमण कर किया। नीमकाथाना के पास तंवरावाटी में मावंडा नामक स्थान पर युद्ध हुआ। जिसमें कछवाह सेना के सामने उन्हें जान बचाकर भागना पड़ा।

इस युद्ध के बारे इतिहासकार चंद्रमणि सिंह अपनी पुस्तक "जयपुर राज्य का इतिहास" के पृष्ठ 95,96 पर लिखती है-"जवाहरसिंह अपनी भारी भरकम सेना और तोपखाने के साथ जब नारनौल से 23 मील दूर मांवडा पहुँचा तो 14 दिसम्बर को पीछे से आ रही कछवाहा सेना ने उस पर आक्रमण किया। यहाँ सामने की ओर एक तंग घाटी थी। उन्होंने अपना सामान आगे भेज कर पीछे सैनिक बल रखा।

राजपूत घुड़सवारों का खुले मैदान का पहला आक्रमण भरतपुर की सेना ने विफल कर दिया और उनकी ओर जवाबी हमला किया। इस पहली सफलता से निश्चिन्त होकर सेना ने अपनी सेना तंग घाटी से घुसा दी। किन्तु जयपुर के घुड़सवार आगे बढ़कर इस तंग घाटी में उनसे जा भिड़े। आगे मुड़कर भरतपुर की सेना ने मुकाबला किया और तोपों के मुँह खोल दिये। कछवाहा घुड़सवारों ने गोलों की परवाह किये बिना तलवारें खींच लीं और भरतपुर की सेना पर टूट पड़े।

जवाहरसिंह की सेना में भगदड़ मच गयी और वे गोलाबारूद और साज सामान छेड़ कर भाग छूटे। राजपूत फिर लूटपाट में लग गये। किन्तु जवाहरसिंह को भागने में सहायता की। दोनों ओर के लगभग 5000 लोग मारे गये, जिनमें आधे से अधिक जाट सैनिक थे। जवाहर सिंह ने अपने बचकर भाग आने को ही अपनी जीत माना।

किन्तु जवाहरसिंह की सेना की तकदीर फिर चुकी थी। वे लुटेपिटे हार कर आये थे। माधोसिंह ने इस जीत के बाद लड़ाई जारी रखी और 16 हजार सैनिकों के साथ भरतपुर राज्य में प्रवेश किया, वे कामा आ कर रुके जहाँ 29 फरवरी 1768 को उसने फिर जवाहरसिंह को हराया, उसके 400 सैनिक और सेनापति दानसिंह को घायल कर दिया। जब 20 हजार सिखों की नयी सेना भरतपुर की सहायता के लिए आयी तो राजपूत अपने राज्य में लौट गये।

माधोसिंह की यह अंतिम लड़ाई थी, 15 मार्च 1768 को मालवा में उनकी मृत्यु हो गई और चार माह बाद जवाहरसिंह अपने ही किसी आदमी के हाथों यमलोक पहुँच गया। इस युद्ध के हताहतों की सूची जयपुर के पोथीखाने में उपलब्ध है।  इसके अनुसार जयपुर के 986 सैनिक मारे गए और 227 घायल हुए। "

मावंडा के इसी प्रसिद्ध युद्ध के बारे इतिहासकार देवीसिंह मंडावा अपनी पुस्तक "राजस्थान के कछवाह" के पृष्ठ- 82,83 पर लिखते है- "ईस्वी सन 1767 में जवाहर सिंह पुष्कर आया तथा जोधपुर के विजयसिंह जी भी पुष्कर आये हुए थे. पुष्कर में जवाहरसिंह और विजयसिंह जी दोनों धर्म-भाई बने। विजयसिंह जी ने माधोसिंह जी को भी पुष्कर बुलाया परन्तु वे नहीं आये।

कामा पर जवाहर सिंह के अधिकार करने की नाराजगी के कारण माधोसिंह जी ने एक सेना वापिस लौटते जवाहरसिंह पर हमला करने भेजी। इस सेना का नेतृत्व धूला के राव दलेलसिंह राजावत कर रहे थे। दलेलसिंह ने बीचून के बनेसिंह को 500 सवारों सहित आगे भेजा| उसका भरतपुर की बड़ी सेना में गगवाने में मुकाबला हुआ जो जयपुर की ओर आ रही थी।

बनेसिंह 500 सवारों के साथ जवाहरसिंह की सेना से युद्ध करते हुये मारा गया| उसका भी काफी नुकसान हुआ, जवाहरसिंह ने अपना रास्ता बदल लिया और जयपुर के उत्तर से होकर जाने लगा| दलेलसिंह ने उसका पीछा किया और तंवरावाटी के मावंडा मंढोली में उसे पकड़ा।

भरतपुर की सेना ने मावंडा में थी और जयपुर की सेना मंढोली में, प्रतापसिंह नरुका माचेड़ी पर महाराजा माधोसिंह जी ने नाराज होकर उसकी जागीर जब्त करली थी। तब से वह भरतपुर जवाहरसिंह के पास चला गया था, परन्तु जब जवाहरसिंह ने जयपुर पर चढ़ाई का इरादा किया तब प्रतापसिंह उसे छोड़ जयपुर की तरफ आ गया था।  वह भी इस युद्ध में शामिल था।

शेखावतों की सेना का संचालन नवलसिंह नवलगढ़ कर रहे थे, दिनांक 14 दिसंबर 1767 को मावंडा-मंढोली का प्रसिद्ध हुआ। जयपुर के सेनापति राव दलेलसिंह राजावत की तीन पीढियां वहां काम आई। भरतपुर की पराजय हुई तथा उसके तोपखाने के अध्यक्ष फ़्रांसिसी समरू जवाहरसिंह को युद्ध स्थल से बचाकर निकाल ले गया। जयपुर की सेना ने फिर भरतपुर पर हमला किया. दिनांक 29 फरवरी 1768 ई. को कामा के युद्ध में फिर भरतपुर की हार हुई। "

दलेलसिंह राजावत का मांवडा-मंढोली युद्ध में प्राणोत्सर्ग

सवाई ईश्वरी सिंह के शासनकाल में राव दलेलसिंह ने राजमहल की लड़ाई सहित अनेक युद्धों में भाग लिया। तत्पश्चात सवाई माधव सिंह प्रथम के शासनकाल में जयपुर रियासत और भरतपुर महाराजा जवाहरसिंह के बीच 14 दिसंबर 1767 में नीम का थाना के पास मांवडा-मंढोली नामक स्थान पर भीषण युद्ध लड़ा गया, जिसमें जयपुर की सेना का नेतृतव वयोवृद्ध राव दलेलसिंह ने किया। इस युद्ध में दलेल सिंह ने अपने कुंवर लक्षमण सिंह और मात्र 11 पौत्र भंवर राजसिंह सहित लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की। इस प्रकार मांवडा-मंढोली के रणक्षेत्र में धूला (भांडारेज) की एकसाथ पीढ़ियां काम आईं।

इस युद्ध का राजस्थानी भाषा के मूर्धन्य साहित्यकार, इतिहासकार श्री सौभाग्यसिंह जी शेखावत ने अपने एक लेख में इस तरह वर्णन किया है- "जवाहरमल्लजी तौ आप ही अहंकार री आधी। राजमद आयौ मैंगळ। फौज नै करहिया रा किला माथै वहीर कीनी। बेहू पखां में जोरदार राड़ौ हुवौ। अेक हजार जाट वीर खेत्रपाल री बळ चढिया। जाटां रौ फौ नीं लागौ। थळी रा तूम्बा री भांत मुंडकियां गुड़ी करहिया रा पंवारां इण भांत अण न्यूंतियां न्यूंतियारां नै रण रूप मंडप में बधाया। काले पाणी रूप कुंकम रा तिलक कर भालांरी नोक री अणियां री चोट रा तिलक किया। मुंडकियां रूप ओसीस रै सहारै पौढाय नै रण सेज सजाई अर ग्रीझ, कावळां कागां नै मांस लोही रौ दान बंटाय आपरी उदारता जताई। पछै परोजै रूपी अपजस’रा डंका बजावता जवाहरमल्लली ब्रज वसुंधरा में आया अर पंवार आपरी विजय रा नगारा घुराया। इण भांत अण न्यूंतिया न्यूंतियारां रौ सुवागत पंवारां कियौ जिकौ अठै सार रूप में जता दियौ।"

रणमल सिंह ने लिखा है कि हमारे गाँव कटराथल के दो राजपूत जयपुर-भरतपुर के बीच हुये युद्ध (मावण्डा) में मारे गए थे। उनकी छतरियाँ आज भी गाँव मैं मौजूद हैं।

 संदर्भ- History of the Jats/Chapter X,p. 168-170
 Jat History Thakur Deshraj/Chapter IX,pp.656-658
 Dr. Raghavendra Singh Manohar:Rajasthan Ke Prachin Nagar Aur Kasbe, 2010,p. 12
 रणमल सिंह के जीवन पर प्रकाशित पुस्तक - 'शताब्दी पुरुष - रणबंका रणमल सिंह' द्वितीय संस्करण 2015, ISBN 978-81-89681-74-0, पृष्ठ 111

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