नीमकाथाना न्यूज़ टीम की धरोहर स्पेशल रिपोर्ट ✍️

सीकर जिले के नीमकाथाना कस्बे से लगभग 10 किलोमीटर दूर अरावली पर्वत श्रंखला की सुरम्य वादियों के बीच बसे इस गांव के भवन निर्माण को देखते ही आभास हो जाता है कि यह एक प्राचीन गांव है। शहरी कोलाहल से दूर एकदम शांत जगह पहाड़ियों की गोद में यह गाँव बसा हुआ है।

गांवडी नामक गांव गणेश्वर के पास गांवड़ी नामक एक गाँव होने की वजह से, गणेश्वर को "गांवडी गणेश्वर" (Ganwari Ganeshwar) नाम से भी जाना जाता है। बरसात के मौसम में यहाँ चारो तरफ हरयाली की मनमोहक चादर पहाड़ियों को ढक लेती है जिससे यहाँ का प्राकृतिक परिवेश श्रद्धालुओं तथा पर्यटकों को बहुत लुभाता है।


गणेश्वर राजस्थान के जिला सीकर के अंतर्गत नीमकाथाना तहसील में ताम्रयुगीन सभ्यता का एक महत्त्वपूर्ण स्थल है। यहाँ से पुरातत्व विभाग को जो प्रचुर मात्रा में ताम्र सामग्री पायी गयी है, वह भारतीय पुरातत्त्व को राजस्थान की अपूर्व देन है। ताम्रयुगीन सांस्कृतिक केन्द्रों में से यह स्थल प्राचीनतम स्थल है। इसीलिए इसे ताम्र सभ्यताओं की जननी भी कहा जाता है।

  गणेश्वर 1978-1988 में पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग द्वारा उत्खनन   

गणेश्वर सभ्यता की खोज सर्वप्रथम रतनचंद्र अग्रवाल ने 1977 में की। बाद में इसकी खुदाई का कार्य राजस्थान राज्य पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग के भूतपूर्व निदेशक श्री आर. सी. अग्रवाल एवं विजय कुमार के नेतृत्व में सन् 1978 से 1988 के मध्य हुआ।

यहाँ पर लाल रंग के मृदभांड मिले हैं जिन पर काले चित्रांकन हैं।  रेडियो कार्बन डेटिंग विधि से इस स्थल की तिथि 2800 वर्ष ईस्वी पूर्व निर्धारित की गई है। जोधपुर से भी इस तरह की सामग्री मिली है। यह भी मान्यता है कि सीकर की साबी नदी किसी समय पूर्वोत्तरगामी होकर यमुना में जा मिलती थी तथा काटली नदी भादरा के पास दृषद्वती से मिल जाती थी।

गणेश्वर में उत्खनन से कई सहस्त्र ताम्र आयुध एवं ताम्र उपकरण प्राप्त हुए हैं

कालानुक्रम के आधार पर राजस्थान के खेतड़ी ताम्र-क्षेत्र के सीकर-झुंझुनू इलाके की समृद्ध ताम्र-खदान के करीब स्थित गणेश्वर स्थल को विशेष रूप से देखा जा सकता है। इस क्षेत्र में खदाई से करीब एक हजार ताम्बे की वस्तुएं मिली हैं। इनमें मछली मारने के कांटे, बाणों के फलक, कुल्हाड़ी, छेनियाँ,औजारों की मूठे, छड़ें एवं भालों के अग्र भाग, ओसीपी (गेरूए रंग के बर्तन), चूड़ियाँ एवं विविध ताम्र आभूषण मिले हैं। इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि यहाँ के निवासी आखेट की स्थिति में थे। यहाँ पर पाई गई सामग्रियों में 99 प्रतिशत ताँबा है। सिन्धु सभ्यता के ताम्बे की आपूर्ति यहीं से होती थी। बागौर, कालीबंगा और गांवडी गणेश्वर की सभ्यताएं समकालीन थी।


कुल-मिलाकर ये परिपक्व हड़प्पा संस्कृति को दर्शाती हैं। गणेश्वर मुख्यतः हड़प्पा को ताम्बे की वस्तुएँ आपूर्ति करता था और वे इससे ज्यादा कुछ नहीं लेते थे। गणेश्वर के लोग आंशिक रूप से कृषि, किन्तु मुख्य रूप से शिकार पर निर्भर थे। यद्यपि उनका प्रमुख शिल्प ताम्र-वस्तुओं का निर्माण था परन्तु वे नगरीकरण करने में असमर्थ थे। गणेश्वर समूह में न तो पूरी तरह शहरी वातावरण था न ही विधिवत ओसीपी/ताम्बा संग्रह की संस्कृति थी। गणेश्वर संस्कृति का अधिकांश भाग भालेनुमा औजारों एवं पत्थर के अन्य औजारों के साथ हड़प्पा-पूर्व ताम्र-पाषाण संस्कृति का माना जा सकता है। जिसने परिपक्व हडप्पा संस्कृति के निर्माण में योगदान दिया।

खेतड़ी में ताम्र भण्डार के मध्य में स्थित होने के कारण गणेश्वर का महत्त्व स्वतः ही उजागर हो जाता है। यहाँ पर किये गए उत्खनन से कई सहस्त्र ताम्र आयुध एवं ताम्र उपकरण प्राप्त हुए हैं। कांटली नदी के उद्गगम पर स्थित गणेश्वर टीले से ताम्रयुगीन संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं।

मकान निर्माण की सामग्री में प्रमुखतया पत्थरो का उपयोग 

यहाँ के मकान पत्थर के बनाये जाते थे। पूरी बस्ती को बाढ़ से बचाने के लिए कई बार वृहताकार पत्थर के बाँध भी बनाये गये थे। कांदली उपत्यका में लगभग 300 ऐसे केन्द्रों की खोज की जा चुकी हैं, जहाँ गणेश्वर संस्कृति पुष्पित-पल्लवित हुई थी।

धार्मिक नगरी गणेश्वर...

गणेश्वर धाम में सभी देवताओं के अलग-अलग मंदिर बने है। इस स्थान का नाम गणों के ईश्वर शिव के नाम पर ही ‘गणेश्वर’ है। यहाँ धाम के सामने एक द्वार बना है, द्वार से प्रवेश करते ही चारों और छोटे-बड़े विभिन्न देवी-देवताओं के मंदिर नजर आते है। भगवान शिव का प्राचीन मन्दिर तथा उसके आस-पास चौबीस अन्य मंदिर, थानेश्वर महाराज का मंदिर तथा संत राव रासलजी का मंदिर दर्शनीय है।


गणेश्वर कुंड में पहाड़ियों से निर्बाध पानी आता रहता है जिसमें सल्फर की मात्रा है यही वजह है कि यहाँ आने वाला हर श्रद्धालु इस कुण्ड में चर्म रोग के निदान हेतु डुबकी लगाना नहीं भूलता। चर्म रोगी भी यहाँ अपने रोग का निदान करने हेतु नहाने आते है।

माना जाता है कि किसी समय गालव ऋषि इसी स्थान पर तपस्या करते थे। इस कारण झरने को गालव गंगा तथा झरने का पानी एकत्र होने से बनी झील को गालव गंगा झील कहा जाता है। उन्होंने इस झील में एक गोमुख लगवाया था। इस झील के पास थानेश्वर महाराज का मंदिर तथा आज से लगभग 500 वर्ष पहले हुए बाण रावरासल जी का मंदिर भी स्थित है। गालव गंगा झील के नीचे ही ठंडे पानी की एक धारा बहती है।

गालव कुंड से बहता है गर्म पानी...

शिव मंदिर में स्थापित शिवलिंग पर प्राकृतिक झरने का पानी एक साफ़नाले के माध्यम से आकर गिरता है। यह जलधारा दिन-रात प्रवाहित होती रहती है। प्राचीन किवदंती है कि अत्यंत प्राचीन काल में एक नाग झरने से पानी लाकर रोज शिवजी को चढ़ाता था। इस मंदिर की दीवारों पर सुंदर चित्रांकन किया गया है। गर्म पानी के बहते झरने को झीणवन कहते हैं।


नीमकाथाना के पास गणेश्वर ही एक ऐसी जगह है। जहां कड़ाके की सर्दी में गरम पानी का झरना बहता है। गणेश्वर नीमकाथाना कस्बे से 15 किमी दूर है। तापमान कितना ही गिर जाए, इस झरने के पानी का तापमान औसत 35 डिग्री के आसपास रहता है। कंपकंपाती सर्दी में लोगों को यह खूब रास आता है। देशभर से धार्मिक पर्यटक यहां आते हैं।

गणेश्वर भौगोलिक स्थिति
  • गणेश्वर तीर्थ नगरी
  • निर्देशांक : 27.6648° N, 75.8200° E
  • देश: भारत
  • राज्य: राजस्थान
  • जिला: सीकर
  • मासत ऊँचाई: 480 m
  • जनसंख्या (2011) कुल: 5271
  • आधिकारिक भाषा: हिन्दी
  • समय मण्डल: भारतीय मानक समय (यूटीसी +५:३०)
  • पिन: 332705
  • दूरभाष कोड:  01574
  • वाहन पंजीकरण:  RJ 23
  • नदी - कांतली नदी के किनारे
  • काल - ताम्रपाषाण काल (ताम्रपाषाण युगीन सभ्यता की जननी)
  • खोज कर्ता /उत्खनन कर्ता - 1977 आर. सी.(रत्न चन्द्र) अग्रवाल
उपनाम :-
  • ताम्र सभ्यताओं की जननी
  • ताम्र संचयी सभ्यता
  • पुरातत्व का पुष्कर
विशेषताएं :-

 यहाँ से लगभग 2800 ई. पू.  के अवशेष प्राप्त हुऐ है।

➧ यहाँ से पाषाण कालीन सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए है।

 यहाँ से मिट्टी का कलश , प्याले , हांड़ी, आदि बर्तन प्राप्त हुये है।

 इस सभ्यता का विस्तार सीकर, झुंझुनूं ,जयपुर व भरतपुर तक था।

 यहाँ से कपिसवर्णि (मटमैला रंग) मृदभांड प्राप्त हुये है , जो छल्लेदार है।

 यहाँ तांबा निकाला जाता था, तथा शुध्द व् औजार बनाने के लिए बैराठ जाता था।

 यहाँ से प्राप्त अधिकांश उपकरण ताम्बे से निर्मित थे। तथा तांबा अन्य स्थानों पर भी भेजा जाता था।

 यहाँ से ताम्र निर्मित कुल्हाड़ी मिली है। शुद्ध तांबे निर्मित तीर, भाले, तलवार, बर्तन, सुईयां, आभुषण मिले हैं।

 यहाँ से मछली पकड़ने के कांटे प्राप्त हुये है जिससे ये विदित होता है कि यह लोग मांसाहारी थे तथा मछली खाने के शौकीन थे।

 मकान ईंटो के ना होकर, पत्थरों से निर्मित थे, तथा सुरक्षा के लिए नगर के चारों ओर पत्थरों का परकोटा व पत्थरों का बांध बना हुआ था। 

लोगों की उम्मीद गणेश्वर तीर्थ स्थल को मिले संरक्षण

गणेश्वर को सरकारी संरक्षण देकर विकास के लिए ग्रामीणों ने कई बार मांग उठाई है। देवस्थान विभाग से भी ग्रामीणों ने गणेश्वर संरक्षित कर विकास की मांग रखी। पीडब्ल्यूडी ने कुंड व गर्म जल स्त्रोत के विकास के लिए बजट जारी किया था, जो कम था। इसके अलावा रायसल सेवा समिति व ग्रामीणों के सहयोग से साफ-सफाई की व्यवस्था हो पाती है। सुविधा मिले तो गणेश्वर में देशी व विदेशी पर्यटकों की संख्या बढ़ सकती है।

Video - 


विदेशी पर्यटक रूकते हैं बालेश्वर में

गणेश्वर में विदेशी पर्यटक भी पहुंचते हैं, लेकिन वहां कोई प्रबंध नहीं होने से इनकी संख्या लगातार कम होने लगी है। गणेश्वर आने वाले विदेशी पर्यटक गणेश्वर में रूकने के बजाय बालेश्वर में रुकते हैं। यहां से नीमकाथाना के सभी प्राचीन धार्मिक स्थलों पर विदेशी पर्यटकों को ट्रेवल एजेंसी के लोग लाते हैं।

Special Report By-  मेश शर्मा गणेश्वर & नीमकाथाना न्यूज़ टी

आप भी अपनी कृति नीमकाथाना न्यूज़.इन के सम्पादकीय सेक्शन में लिखना चाहते हैं तो अभी व्हाट्सअप करें- +91-9079171692 या मेल करें sachinkharwas@gmail.com


Note- यह सर्वाधिकार सुरक्षित (कॉपीराइट) पाठ्य सामग्री है। बिना लिखित आज्ञा के इसकी हूबहू नक़ल करने पर कॉपीराइट एक्ट के तहत कानूनी कार्यवाही हो सकती है।

- ऐसी ही अपने क्षेत्र की ताजा ख़बरें सबसे पहले पाने के लिए डाउनलोड करें Digital Neemkathana App गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध।