नीमकाथाना न्यूज़ टीम की धरोहर स्पेशल रिपोर्ट ✍️

भौगाेलिक स्थिति- राजस्थान के सीकर जिले में पाटन कस्बा, नीमकाथाना तहसील में 27.490 उत्तरी अक्षांश तथा 75.580 पूर्व पर अवस्थित है। यह जिला मुख्यालय से 95 किलोमीटर पूर्व की ओर तथा नीमकाथाना से 21 किलोमीटर की दूरी पर बसा हुआ छोटा सा क़स्बा है। यह राजस्थान-हरियाणा की सीमा पर स्थित हैं।

पाटन दुर्ग (गिरी दुर्ग)
इतिहास- रियासतकाल से ही पाटन-नीमकाथाना-कोटपूतली क्षेत्र को ताेरावाटी (तंवरावाटी) के नाम से जाना जाता है। ताेरावाटी क्षेत्र प्रतिहारकाल से ही ताेमरवंशी (तंवरवंश) राजपूतों का राज्य रहा है, किन्तु समय-समय पर यहां चौहान शासकों का भी शासन रहा है।

तंवरवंश के अनंगपाल ताेमर (प्रथम) ने 9 वीं शताब्दी में दिल्ली को अपनी राजधानी बनाया था। बाद में अनंगपाल द्वितीय ने सन् 1050 में दिल्ली के शासन की बागडोर अपने हाथों में लेकर शेखावाटी तक अपने राज्य का विस्तार किया।

तंवर शासकों का ध्वज चिन्ह महावीर (हनुमान) है तथा ये श्रीकृष्ण के उपासक है। इनकी अधिष्ठात्री देवी योगमाया या सारंग है। दिल्ली में तुर्कों एवं गौर शासकों के आगमन के पश्चात् अनंगपाल द्वितीय के पौत्र ने सांखला राजपूतों को युद्ध में हराकर ताेरावाटी में प्रवेश किया तथा पाटन को अपनी राजधानी बनाया था।

अजमेर-दिल्ली के चौहान वंश के अन्तिम स्वतंत्र शासक महाराज पृथ्वीराज तृतीय, जाे अनंगपाल द्वितीय के भान्जे थे (सन् 1179-1193) के समय ताेरावाटी प्रदेश पर तंवर उनके अधीन सामंतों के रूप में शासन करते थे।

पाटन महल
सन् 1601 में मुंगेर (बिहार प्रदेश) के युद्ध में बादशाह अकबर की ओर से पाटन के राव बलभद्रसिंह ने अपने तंवर साथियों के साथ युद्ध में भाग लिया था। मुंगेर दुर्ग को फतह कर पाना अति दुश्कर कार्य था, राव बलभद्रसिंह ने अपने साहस का परिचय देते हुए दुर्ग के द्वार को ताेड़कर इस अजेय दुर्ग को अपने अधीन ताे कर लिया, परन्तु उसी समय वीरगति को प्राप्त हो गये। इनके साथ इनकी एक रानी भी सती हुई थी, जिनकी छतरी मुंगेर में आज भी विद्यमान है।

अग्निस्नान करने वाली उस सती की याद में उनकी समाधि पर प्रतिवर्ष मेला लगता है। राव बलभद्रसिंह की स्मृति में भी एक छतरी का निर्माण किया गया जो आज भी उस रणबांकुरे की वीरता और साहस की अमर कहानी का प्रतीक बनकर खड़ी है।

सन् 1767 में भरतपुर के जाट शासक जवाहरसिंह एवं जयपुर के महाराजा माधवसिंह के मध्य पाटन रियासत के मावण्डा-मंढोली का घमासान युद्ध हुआ। इस युद्ध में जवाहरसिंह मात खाकर भाग खड़ा हुआ। चूंकि पाटन एक स्वतंत्र रियासत थी इसलिए पाटन के राव सम्पतसिंह ने इस युद्ध में तटस्थ रहना ही उचित समझा।

सन् 1789 में मराठों व राठौड़ राजपूतों के बीच युद्ध भी पाटन के पास ही हुआ था। तंवरों की राजधानी पाटन के पास मराठों की ताेपें आग उगलने लगी थी और राजपूत सेना पीठ दिखाकर भाग खड़ी हुई। यद्यपि युद्ध कला की दृष्टि से पाटन एक अजेय दुर्ग था, किन्तु मराठा सेना का नेतृत्व कर रहे जनरल द बॉय की रणनीति के कारण राठौड़ों को करारी हार का सामना करना पड़ा था। मराठों ने उनके 1300 ऊँट, 21 हाथी, 300 घाेड़े तथा 105 ताेपें लूट ली तथा बचे हुए सैनिकों को आत्मसमर्पण करना पड़ा।

"मराठों की इस विजय के कारण किसी चारण ने कहा- घाेड़ा, जाेड़ा, पावड़ा, मूठवाली ए मराेड़ पाटन मं पधरायगा, रकम पांच राठौड़।"

पाटन के राव सम्पतसिंह ने मराठा महादजी सिंधिया के आगे आत्मसमर्पण कर दिया और मराठों के करद बन गये थे। यह प्रथम बार हुआ था कि इस अजेय दुर्ग को किसी ने फतेह किया था। युद्ध के पश्चात् की विभीशिका ने पाटन के जन-जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया था तथा आर्थिक दृश्टि से पाटन टूट चुका था।

सन् 1792 से सन् 1803 तक यह मराठा शासकों का करद रहा। इस समय राजा जवाहरसिंह पाटन के शासक थे। राव जवाहरसिंह की दाेनों रानियों से उनके पुत्र लक्ष्मणसिंह एवं बिशनसिंह हुए। सौतेले भाई बिशनसिंह के प्रति अपने पिता के अतिरिक्त प्रेम को देखकर लक्ष्मणसिंह ने बादलगढ़ के महल में अपने पिता की हत्या कर दी तथा सौतेले भाई व मां को बंदीगृह में डाल दिया।

लक्ष्मणसिंह की कहानी आज भी ‘बादलगढ़ महल‘ की ऊपरी मंजिल का प्रकोष्ठ कह रहा है। जवाहरसिंह को अपनी प्राण रक्षा हेतु कितना संघर्ष करना पड़ा हाेगा, इस बात का आकलन प्रकोष्ठ में स्थित स्तम्भ, जिसकी आड़ में वे बचने का प्रयास कर रहे थे, पर पड़े तलवार के अनेक निशानों से लगाया जा सकता है।

पाटन महल
राव उदयसिंह के समय जयपुर व जाेधपुर रियासत के सीमा विवाद में उदयसिंह ने ही मध्यस्थता करवा कर विवाद का निपटारा करवाया था। इस बात से सिद्ध हाेता है कि पाटन रियासत का कद कितना ऊँचा था। नेपाल राजघराने की राजकुमारी का विवाह उदयसिंह के साथ हुआ था।

निर्माणकाल एवं निर्माता- तंवर वंश की 186 वीं पीढ़ी के राव बलभद्रसिंह ने सन् 1564 में आगरा के लाल किले की नकल पर पाटन में दुर्ग का निर्माण करवाया था। राव केसरीसिंह ने सन् 1639 में पाटन के महलों का ‘बादलगढ़ महल‘ नाम से निर्माण करवाया था।

राव केसरीसिंह का समय पाटन के इतिहास में स्वर्णयुग कहा जा सकता है। इनके समय में पाटन के महलों का विस्तार हुआ तथा मूर्तिकला व चित्रकला का भी विस्तार हुआ। पाटन दुर्ग व प्राचीन महल (मध्य) के अलावा भी एक अन्य नवीन महल भी बना हुआ है, जिसे बादलगढ़ के नाम से जाना जाता है। यह लगभग 150-200 वर्श पुराना है तथा ये महल पाटन नगर की नयी आबादी में स्थित है।

बादल गढ़

सैन्य स्थापत्य
लगभग 1500 मीटर ऊँचे पहाड़ पर बनवाये गये ऐतिहासिक दुर्ग का क्षेत्रफल लगभग 300 बीघा है। इस किले पर छः विशाल बुर्जों का निर्माण किया गया है, जिसमें तीन अग्रभाग तथा तीन पश्च भाग में बनवायी गई है। अग्रभाग की बाँयी बुर्ज के समीप ही दुर्ग का प्रवेश द्वार है, जिसमें एक के बाद एक तीन अन्य द्वार निर्मित किये गये हैं। मध्य महल में प्रवेश से पहले एक के बाद दाे बड़े दरवाजे बने हुए हैं, जिनके ऊपर की छत पर प्रहरी हमेशा चौकस रहते थे।

इनमें बन्दूक की नलियों के लिए 101 बनाये गये छिद्र इस तरह बनाये गये है कि वहां स्थित व्यक्ति बाहर का पूरा नजारा ले सकता था परन्तु बाहरी व्यक्ति ऊपर बैठे व्यक्ति को देख नहीं सकता था। महल के चारों कोनों पर चार छोटे बुर्ज बनाये गये हैं, जिनमें अग्रभाग  के दाेनों बुर्जों की ऊंचाइ पश्च् भाग के बुर्जों की ऊँचाई से कम है। आगे के बुर्ज एक मंजिला तथा पीछे के  दाेनों बुर्ज दाे मंजिला है, इनमें बहुत सारे खिड़कीनुमा झराेखें बने हुए है।

नागरिक स्थापत्य- प्रांगण में दाेनों ओर बहुत सारे कक्षों का निर्माण किया गया है, लेकिन वर्तमान में इन कक्षों की छत टूटी हुई है। इस महल के नीचे एक गुप्त महल भी बना हुआ है, जिसमें जाने के लिए सीढ़ीयां बनी हुई है। शाैचालय तथा स्नानागार का भी किले में निर्माण करवाया गया है।


इस खण्डहररूपी दुर्ग से निकलकर पहाड़ से नीचे उतरने पर तलहटी में प्राचीन महल (मध्य महल, यह किले तथा नीचे समतल पर निर्मित बादलमहल के मध्य निर्मित हाेने के कारण, मध्य महल भी कहलाता है) बना हुआ है। पुराना महल जाे कि भूमि के समतल से तीन मंजिल नीचे व चार मंजिल ऊपर अर्थात् कुल 7 मंजिला बना हुआ है, स्थापत्य कला की दृष्टि से यह एक महत्वपूर्ण स्थल है।

यह महल पाटन की पुरानी आबादी में स्थित था। इस महल का प्रांगण बहुत बड़ा है, इस प्रांगण में राजा का विशाल दरबारनुमा कक्ष बना हुआ है, जहां शासक अपनी प्रजा की समस्याएं सुनते थे। इसके ऊपरी भाग पर भव्य छतरीनुमा कक्ष का निर्माण किया गया है। जवाहरसिंह के शासनकाल में पाटन में स्थापत्य कला का अधिक विकास हुआ। अनेक छतरियों का निर्माण हुआ जिनमें बने चित्र, भित्ति चित्रकला, के अदभुत् नमूने कहे जा सकते हैं।

इसके चारों तरफ का बगीचा अभी नवीन पेड़-पौधों से सुसज्जित है। महल में बहुत सारे झराेखें बनाये गये है। इसकी बाहरी दीवारों पर सुन्दर माण्डणें उकेरे गये है। महल के अन्दर आकर्शक चित्रकारी की गई है, इनमें पशु-पक्शियों तथा युद्ध स्थल के चित्र यहां आने वाले पर्यटकों का ध्यान स्वतः ही अपनी ओर आकर्षित करते हैं।


यहां के बादलगढ़ महल की बनावट, जयपुर के हवामहल से मेल खाती है। महल के अन्दर चांदी के पुराने बर्तन, तलवारें इत्यादि सहेज कर रखे गये है। वर्तमान में राव दिग्विजयसिंह ने बादलगढ महल को हैरिटेज हाेटल का रूप दे दिया है और मध्य महल का जीर्णोंद्धार किया गया है परन्तु महाराज की गद्दी वाले ऐतिहासिक पाटन के प्राचीन दुर्ग को अभी तक संरक्षण नहीं मिला है।

संदर्भ- १. शर्मा , एम.एल., हिस्ट्री ऑफ दी जयपुर स्टेट, जयपुरः राजस्थान इंस्टिट्यूट ऑफ
हिस्टोरिकल रिसर्च, 1969,
२. गुप्ता, मोहनलाल, जयपुरः जिलेवार ग्रंथागार सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक अध्ययन, जोधपुरः नवभारत प्रकाषन, 2004
३. बख्शी, झुंथालाल, माधववंश प्रकाष (हस्तलिखित), (सरस्वती पुस्तकालय,फतेहपुर)

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Special Report By-  नीष टाँ& नीमकाथाना न्यूज़ टी

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